चिड़िया

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छोटी सी चिड़िया खुद को अपनी नादानी में इस
ख़ूँख़ार दुनिया के सामने परोस बैठी
इस उम्मीद में कि लोग चाव से पेश आएँगे, पर अपने ही घर मे लोग बने अँग्रेज़
ना जाने किसको क्या साबित करने के लिए, अपनी हथेलियों के बजाए उठा लिए
चाकू, काँटे और चम्मच, चाव से तो पेश आए, पर चाव उनका शरीर के लिए
किसे क्या मतलब था, ना कोई दिलचस्पी, उड़ना चाहती थी वो
पर कोई नही जानना चाहता था, उसकी उड़ान किस तरफ होने को बेताब है
क्या सपने है, क्या जज़्बातों का बयान है, क्या उसके चेहरे पे अंदरूनी मुस्कान है
किसे मतलब! पैदा हुई वो चिड़िया जो थी, उसके खुले पर देख कर ही सब बेचैन थे
चाकू, छुरी, चम्मच देखकर घबराई नहीं थी वो
हिम्मत टूट चुकी थी पर उड़ने की चाहत ने दम नहीं तोड़ा था
पर ये दुनिया कठोर, उसको कील बनाए खुद हथौड़ा बन बैठी थी
जब उड़ान भरे तब कुचली जाए, हवा के रुख़ को चीरते हुए उड़ने की ताक़त रखने वाली वो चिरैया

कमज़ोर कील की तरह उसी खूँखार दुनिया के लिविंग हॉल में सूरजमुखी की तस्वीर सजाए,
थक हार के परेशान, वो उस नकली तस्वीर के बोझ को लिए दिए गिरने को तैयार थी
अरे! वो तो बादलों के बीच खुद के उड़ान से आसमान को रंगना चाहती थी
पर उसकी दुनिया ने उसे पेंटब्रश की जगह रेज़र थामने पर मज़बूर कर दिया
और उसके अंदर के कलाकार ने खुद की कलाईयों पर ही कैनवास बनाकर,
मुस्कुराते हुए, खुद को हर एक बंदिशों से आज़ाद करते हुए
उसी खाली कानवास पर आसमान बनाकर लाल रंग लिया
बड़ी हो गयी थी और नादान सी सूरत पे हल्की सी मुस्कुराहट भी थी
पर क्या कहने इस कठोर दुनिया के,
आज उसके शव पे भी मक्खियाँ बड़े चाव से
भिनभिना रही थी|

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